संजीव शुक्ल ‘अतुल’

कुछ मन की बातें

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लोक सेवा आयोग की अध्यक्षी

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लोक सेवा आयोग के ललित ललाम छवि रखने वाले अध्यक्ष की छुट्टी हो जाने से उन तमाम गुंडों की महत्वाकांक्षाएँ मिट्टी में मिल गयीं जो उनके बाद अध्यक्ष की कुर्सी पर आँख गड़ाए थे । वह चाहते थे कि अध्यक्ष महोदय पानी पीने के बहाने से या फिर किसी भी तरह की शंका-निवारण के बहाने से कुर्सी से उठें और इधर वह अध्यक्ष की कुर्सी पर अपना रूमाल फेंककर सीट का रिज़र्वेशन सुनिश्चित करवा लें । लेकिन हाई कोर्ट के फैसले से करा धरा सब बेकार हो गया । तमाम कुवांरी इच्छाएँ बिन-ब्याहे ही सती हो गयीं । उन तमाम गुंडों की पत्नियों की सिंदूरी अभिलाषा का रंग फीका पड़ गया जो भविष्य में अध्यक्ष की पत्नी बनने का ख्वाब देख रहीं थीं । उनके पति जो अभी तक सिर्फ गुंडा थे अध्यक्षी पाते ही गुंडाधिकारी बन जाते । लेकिन खैर ।
वैसे न्यायाधीश महोदय को डराने वाला यह फैसला सुनाना ही था तो सुनाते ही ,उनको कौन रोक सकता था लेकिन मानवीय पहलू पर गौर करते हुए उन्हें कम से कम करवा-चौथ तक तो रुक ही जाना चाहिए था । इससे न्यायपालिका के फैसले को सुरक्षित रखने की परंपरा का निर्वाह भी हो जाता और किसी का करवा-चौथ (उत्साह सहित) भी सफल हो जाता । लेकिन कोर्ट के विधान के आगे कब किसकी चली है । दो-दो सनातनी परंपराओं के निर्वाह का संयोग यूं ही जाता रहा…………..
पूरा आर्टिकल देखे –
www.sanjeevshuklaatul.blogspot.in/2015/10/blog-post_17.html

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