संजीव शुक्ल ‘अतुल’

कुछ मन की बातें

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पुरस्कारों की वापसी

Posted On: 7 Nov, 2015 Others,Politics,Others में

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पुरस्कार वापस करने वाले जिस नाटकीय अंदाज में पुरस्कारों को वापस कर रहें हैं उससे न केवल इन दुखद घटनाओं पर लोगों को सियासत करने का मौका मिल रहा है अपितु इससे संवेदनशील विषयों पर स्वस्थ-बहस की चिंतन–परंपरा भी बाधित हुई है।
पुरस्कार लौटाना असहमति दर्शाने का एक तरीका है। पूर्व में भी कई लोगों ने अपने पुरस्कार या उपाधियाँ लौटाई हैं । जी सुब्रमण्यम अय्यर ने बेसेंट की गिरफ्तारी के विरोध में ‘सर’ की उपाधि लौटा दी थी तो जालियाँवाला बाग हत्याकांड से आहत होकर टैगोर ने अपनी ‘नाइट’ की उपाधि त्याग दी थी । इसी तरह महात्मा गांधी ने भी अंग्रेज़ सरकार के विरुद्ध अपने विरोध को मुखर करते हुए ‘केसर-ए–हिन्द’ की उपाधि लौटा दी थी । यहाँ यह ध्यान देने की जरूरत है कि जिन घटनाओं के विरोध में इन महापुरुषों ने अपनी उपाधियाँ लौटाई थीं वे घटनाएँ अंग्रेज़ सरकार की नृशंस कार्यवाहियों का परिणाम थीं । जालियांवाला बाग हत्याकांड को अंजाम देने वाले जनरल डायर की अंग्रेज़ सरकार ने खुलकर तारीफ की थी । ऐसी परिस्थिति में उपाधियों को लौटाना जनभावनाओं का सम्मान करने जैसा था ।
बेशक आपके पास असहमति की अभिव्यक्ति का अधिकार है और उस अधिकार के तहत आप विरोधस्वरूप अपना पुरस्कार लौटा सकते हैं , मगर यह विरोध पूर्वाग्रह से मुक्त होना चाहिए । असहमति या विरोध जिन वजहों को लेकरके है उन पर ईमानदारी से चर्चा होनी चाहिए । जिस पार्टी या सरकार पर असहिष्णुता को बढ़ावा देने का आरोप लगाया गया है , कम से कम उसको अपनी बात रखने का मौका तो दिया जाना चाहिए । वर्तमान में जिन घटनाओं का हवाला देकर अपने पुरस्कार या उपाधियाँ लौटाई हैं । जी सुब्रमण्यम अय्यर ने बेसेंट की गिरफ्तारी के विरोध में ‘सर’ की उपाधि लौटा दी थी तो जालियाँवाला बाग हत्याकांड से आहत होकर टैगोर ने अपनी ‘नाइट’ की उपाधि त्याग दी थी । इसी तरह महात्मा गांधी ने भी अंग्रेज़ सरकार के विरुद्ध अपने विरोध को मुखर करते हुए ‘केसर-ए–हिन्द’ की उपाधि लौटा दी थी । यहाँ यह ध्यान देने की जरूरत है कि जिन घटनाओं के विरोध में इन महापुरुषों ने अपनी उपाधियाँ लौटाई थीं वे घटनाएँ अंग्रेज़ सरकार की नृशंस कार्यवाहियों का परिणाम थीं । जालियांवाला बाग हत्याकांड को अंजाम देने वाले जनरल डायर की अंग्रेज़ सरकार ने खुलकर तारीफ की थी । ऐसी परिस्थिति में उपाधियों को लौटाना जनभावनाओं का सम्मान करने जैसा था ।
बेशक आपके पास असहमति की अभिव्यक्ति का अधिकार है और उस अधिकार के तहत आप विरोधस्वरूप अपना पुरस्कार लौटा सकते हैं , मगर यह विरोध पूर्वाग्रह से मुक्त होना चाहिए । असहमति या विरोध जिन वजहों को लेकरके है उन पर ईमानदारी से चर्चा होनी चाहिए । जिस पार्टी या सरकार पर असहिष्णुता को बढ़ावा देने का आरोप लगाया गया है , कम से कम उसको अपनी बात रखने का मौका तो दिया जाना चाहिए । वर्तमान में जिन घटनाओं का हवाला देकर ………..और पढ़ें


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