संजीव शुक्ल ‘अतुल’

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मिड –डे-मील में सुधार की गुंजाइश

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आज आए दिन मिड –डे –मील में होने वाली गड़बड़ियों से इस क्रांतिकारी कार्यक्रम की सार्थकता संदेह के घेरे में आ गयी है। शायद ही कोई वर्ष ऐसा गुजरता हो जब इस कार्यक्रम के तहत परोसे गए संदूषित भोजन ने किसी त्रासदी को जन्म न दिया हो। कभी भोजन में मरा हुआ चूहा निकलता है तो कभी छिपकली। अखाद्य पदार्थों की मिलावट तो एक आम बात है। अभी हाल ही में लखनऊ के एक स्कूल में मिड-डे-मील के तहत परोसे गए भोजन को खाकर बच्चे गंभीर रूप से बीमार हो गए और उनको तत्काल अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। इसी तरह 16 जुलाई 2013 को बिहार के सारण जिले के धरमसती गाँव में संदूषित भोजन करने से 23 बच्चों की मृत्यु हो गयी। इन घटनाओं की पुनरावृत्ति से मिड-डे-मील के प्रति एक भय सा पैदा हो गया है। यह आश्चर्य और शर्म की बात है कि हम अभी तक ऐसा तंत्र नहीं बना पाए हैं जो इन घटनाओं को रोक सके।
बेशक यह एक अच्छा प्रोग्राम है और यह भारत सहित विश्व के लगभग 169 देशों में गतिमान है। इस महत्वाकांक्षी योजना का वास्तविक उद्देश्य बच्चों को शिक्षा से जोडना था। ‘भूखे पेट पढ़ाई नहीं हो सकती‘ की भावना से शुरू किए गए इस कार्यक्रम से यह अपेक्षा की गई थी कि मिड-डे-मील के आकर्षण के चलते गरीब बच्चे अधिकाधिक संख्या में स्कूल की तरफ रुख करेंगे। परिणामस्वरूप भारत में भी कानून बनाकर यह प्रावधान किया गया कि स्कूल जाने वाले प्रत्येक बच्चे को मुफ्त और पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराया जाय। इस संदर्भ में भारत सरकार द्वारा 15 अगस्त 1995 को इस कार्यक्रम की शुरुआत की गई। इसी क्रम में अप्रैल 2001 में ‘पीपुल्स यूनियन फार सिविल लिबरटीज़ ‘की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी प्राइमरी स्कूलों में एम डी एम को लागू करने का आदेश दिया। फलतः 28 नवंबर 2001 को यह योजना पूरे देश में लागू कर दी गई।
साक्षारता-दर बढ़ाने के उद्देश्य से यह योजना बेहद आकर्षण से भरी हुई थी। तब सोंचा गया था कियह योजना शैक्षिक-जगत में क्रांतिकारी परिवर्तन का माध्यम बनेगी ,पर आंकडो की बात जाने दीजिये। वास्तविक धरातल पर यह योजना नया कुछ न दे सकी उल्टे इसने शिक्षा की गुणवत्ता को प्रकारांतर से प्रभावित ही किया है। सिर्फ लालच देकर शिक्षा से बच्चों को जोड़ने की यह रणनीत कारगर सिद्ध नहीं हुई।
आज से 40-50 साल पहले……………

http://www.sanjeevshuklaatul.blogspot.in/2015/09/blog-post_16.html

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