संजीव शुक्ल ‘अतुल’

कुछ मन की बातें

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**राजनीति का हुड़दंगी विश्लेषण**

Posted On: 8 Jun, 2017 में

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प्रदेश के चुनाव परिणामों ने राजनैतिक जगत में बड़ी खलबली मचा दी है। ख़बरों के भूखे लोगों के लिए एक खुराक मिल गयी; बैठे- बिठाए लोगो को को एक मुद्दा मिल गया। लोग-बाग सब काम छोड़-छाड़ के राजनैतिक गुणा-भाग व नफा- नुकसान के आकलन में जुट गए। कोई किसी से कम नहीं,सब के सब धुरंधर खोजी विश्लेषक। कुछ तो मास्टर-माइंड की भूमिका संभाल लेते हैं और ऐसे-ऐसे तर्क व खुफिया बातें पेश करते हैं जो कि उससे पहले किसी के दिमाग़ में नहीं आयीं थी। यहाँ तक कि जिसे हाई कमान कहा जाता है उसके दिमाग में भी नहीं। लेकिन भाई यहीं तो निशानी है धुआंधार प्रगतिशील विश्लेषकों की।सामान्य बातें तो सभी लोग जानते हैं,बात तो तब जब कोई नई बात पेली जाय। हाँ आघात तब लगता है जब राजनीति का क,ख,ग,घ भी न जानने वाले लोग बड़ी-बड़ी बातें कर राजनैतिक बुआ बनने लगते हैं। कोई गठबन्धन को राजनैतिक भूल बता रहा तो कोई राहुल की योग्यता पर सवाल खड़ा कर रहा है। अब जैसे इन्हीं को ले लीजिये ; एक कट्टर असहिष्णु विश्लेषक ने कांग्रेस को चुकी हुई पार्टी बता दिया । अब क्या भला ऐसा माना जा सकता है। यही दुखद पहलू है इस देश का, जिनकी राजनैतिक समझ कुल तीन-चार साल की है वो 125 साल पुरानी कांग्रेस पर टिपण्णी करने लगते हैं। ऐसे लोगों को चुल्लू भर पानी भी नसीब नहीं होता।
माना कि गठबंधन के समय कांग्रेस की हालत उन यात्रियों जैसी थी जिन्हें डग्गामार बसों में सीट न मिलने पर कंडक्टर के द्वारा खड़ा कर दिया जाता है। मगर जब बात समाज के हित के लिए हो तो व्यक्तिगत मान-अपमान मायने नहीं रखता। यही वह बात है जो उ.प्र. में सीटों के लिए तरस रही कांग्रेस को महान बनाती है। यह गठबंधन जरूरी था,सहिष्णुता स्थापन के लिए। सहिष्णुता को बचाने के लिए यह एका तब और जरूरी हो जाता है जब असहिष्णुता के खिलाफ आवाज उठाने वालों के पास वापस करने के लिए एक भी पुरस्कार न बचे हों । ऐसे लोगों को, कायदे से वापस करने के पहले उस मानपत्र की दस-दस फोटो कॉपी कराके रख लेनी चाहिए थी,ताकि तथाकथित विरोध को सतत् बनाया जा सके।
यह गठबन्धन पारिवारिक समाजवाद के सरंक्षण के लिए भी जरूरी था। अखिलेश जी इसको शिद्दत से महसूस कर रहे थे, वह समाजवाद से पारिवारिक समाजवाद तक की यात्रा में नए आयाम जोड़ना चाहते थे। वो उसे बुलंदी पर पहुँचाने के लिए उतारू थे। यद्यपि वह पारिवारिक समाजवाद की अब तक की प्रगति के लिए इसके संस्थापक और अपने बापू के प्रति कृतज्ञ तो थे पर पता नही क्यों उन्हें इधर लगने लगा था कि उनके बापू अपने मूल्यों से भटकने लगे हैं। वे समाजवादी कुनबे में कुछ बाहरी लोगों को घुसेड़ रहे हैं। सो समाजवादी मूल्यों की खातिर वो अपने पिताजी से भी भिड़ गए और भिड़े तो ऐसा भिड़े कि फिर किसी को नहीं छोड़ा । चाचा को तो भतीजे के नाम से ही कंपकपी आने लगती। इन्हीं मजबूरियोके चलते सपा -कांग्रेस गठबंधन जरूरी लगा होगा। उन्हें लगा होगा कि कहीं जनता मोदी के बहकावे में न आ जाये और उनके विकास को मानने से इन्कार कर दे। सो भाजपा को राजनैतिक दंगल में मात देने के लिए गठबंधन बहुत ही आवश्यक था। लेकिन अखिलेश के सर पर अभीभी लड़ने का भूत सवार था जिसके चलते उन्होंने कांग्रेस को 2-4 फ़ालतू सीटें भी देने से साफ़ मना कर दिया । वह तो कहिये कि राहुल गांधी ने ज्यादा सीटें नहीं मांगी थी और जितनी मांगी थी उतनी भी नहीं मिलने पर बुरा नहीं माना। वैसे ये राहुल गांधी का बड़प्पन है कि वो किसी बात का बुरा नहीं मानते मगर एक मुख्यमंत्री ने तो अपना छुटप्पन दिखा दिया। अरे भाई इतनी बड़ी पार्टी के नेता ने आपसे कुछ सीटें क्या मांग दीं आप ज़मीन ज़मीन नही चले, हवा में उड़ने लगे। ऐसी कांग्रेसी हाय लगी कि बस पूछो नहीं।
जब बात कांग्रेस की चल ही पड़ी है तो यह बताना लाज़िमी है कि राहुलजी की सांगठनिक क्षमता ग़जब की है जो कि इस चुनाव में साबित भी हो गया है। यह राहुल जी के सांगठिनिक कौशल का ही कमाल है कि उन्होंने कांग्रेस के वोट प्रतिशत को शेयर मार्केट की तरह उछाल दिया। उन्होंने सिर्फ मिली हुई 100 सीटों पर 7 सीटें हथिया कर दिखा भी दिया।अद्भुत था चुनाव प्रबन्धन! अब आप बताइये कि यही सीटें अगर 403 में मिली होती तब क्या परसेंटेज रहता??
चुकी हुई कांग्रेस कहने वालों को शायद कांग्रेस की जुझारू क्षमता का शायद अंदाजा नहीं था. इसकी जुझारू क्षमता का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि उसने इस चुनाव में अनुप्रिया पटेल की पार्टी को बहुत कड़ी टक्कर दी। Neck to Neck मुकाबला था ।
इसके बावजूद जब कुछ लोग राहुल गांधी के सामान्य ज्ञान पर सवालिया निशान लगाते हैं तो दुःख होता है। कहते है कि राहुल गांधी आलू की फैक्ट्री लगाने की बात करते हैं। पता नहीं, उन्होंने ऐसा कहा भी था या नहीं और अगर कहा भी है तो सिर्फ कहा ही तो है, लगा तो नहीं दी । कहने का मतलब यह है कि बेवजह बड़े नेताओं की काबिलियत पर शक नहीं करना चाहिए। वो कितनी ही हल्केपन वाली बातें करें आप उसको हल्के में लेने की गलती न करें। चुनाव होली में हुए हैं तो इसके मतलब यह थोड़े ही हैं कि आप विश्लेषण में हुड़दंगी मचाएंगें ।।।।।
— संजीव शुक्ल’अतुल’

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